अपनी जाल में फंस रही हैं कांग्रेस

 अपनी जाल में फंस रही हैं कांग्रेस 

नई दिल्‍ली, ( कविलाश मिश्र)। 
  कांग्रेस मुक्‍त देश का नारा वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की तरफ से लोकसभा में दिया गया। तब से कांग्रेस पार्टी काफी कठिन दौर से गुजर रही हैं। इस नारे के बाद से जहां भी विघानसभा के चुनाव हुए या कही उपचुनाव हुए कांग्रेस हाशिए पर जाती नजर आई। वर्जमान में मिज़ोरम, मणिपुर और मेघालय जैसे उत्तरपूर्व के छोटे राज्य और तीन बड़े राज्य हिमाचल प्रदेश, केरल और कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है। इसके अतिरिक्‍त हाल-फ़िलहाल तक उत्तराखंड में भी कांग्रेस की सरकार थी जिसके भविष्‍य का फैसला फलोर टेस्‍ट पर 10 मई को होना हैं। 
 इन राज्यों में अगले साल चुनाव होने हैं और वर्तमान स्थिति को देखते हुए कहा जा सकता हैं कि कांग्रेस की इन राज्यों में चुनाव जीतने की संभावना कम हैं। हिमाचल प्रदेश लगभग प्रत्‍येक पांच वर्श के बाद सरकार बदल जाती हैं। यहीं हाल उत्‍तराखंड के बारे में कहा जा सकता हैं। वैसे भी हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के ख़िलाफ़ आय से अधिक संपत्ति जमा करने के मामले में सीबीआई की जांच चल रही है और उनके लिए बने रहना आसान नहीं होगा। इसके अलावा बीजेपी के उभरते सितारों में शुमार अनुराग ठाकुर विपक्ष में हैं। वे भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के ताक़तवर सचिव हैं। इस राज्य में कांग्रेस के पास उनके जैसे करिश्मा वाला कोई नेता नहीं है।उत्‍तराखंड के निर्वतमान मुख्‍यमंत्री हरीश रावत की सरकार भी भ्रष्‍टाचार के मामले में फंसी है। साथ ही स्‍वयं श्री रावत ए‍क स्टिंग आपरेशन में फंसे हैं। 
   केरल में चुनाव हो चुके हैं। परिणाम 19 मई को आना हैं। अगर कांग्रेस हारती है तो राज्य की राजनीति पर नज़र रखने वालों के लिए ये अचरज की बात नहीं होगी। इस राज्य से दो ही बातें महत्व की रहेंगी कि क्या कांग्रेस उस वाम मोर्चे से भी हार जाएगी जिसका देश भर से लगभग सफाया हो गया है? दूसरी बात यह कि क्या बीजेपी का मत प्रतिशत बढ़ेगा, क्योंकि उसे मलयाली हिंदुओं का समर्थन मिल रहा है। असम में कांग्रेस की सरकार हैं लेकिन 19 मई को जो चुनाव परिणाम आने वाला हैं वह कांग्रेस के लिए चौंकाने वाला हो सकता है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस कहीं नहीं हैं। 
   कांग्रेस के मुख्यमंत्री का नाम कर्नाटक में कई घोटालों में सामने आया है। दूसरी ओर उनका बेटा एक ऐसी कंपनी में हिस्सेदार है जिसे सरकारी ठेके मिले हैं। दुसरी तरफ यहां बीजेपी में पार्टी नेता के तौर पर पूर्व प्रमुख रहे येदियुरप्पा की वापसी हो गई है। हालांकि, उन्‍हें भी पिछली सरकार में भ्रष्टाचार के आरोप में पिछली विधानसभा में इस्तीफ़ा देना पड़ा था। लेकिन वे अभी भी लिंगायत समुदाय में काफ़ी लोकप्रिय हैं। यहां, दो साल बाद चुनाव होने हैं। 
  ओडिशा, आंध्र प्रदेश और बीजेपी शासित गुजरात, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी कांग्रेस के लिए सफल जमीन नहीं कहा जा सकता है। कोई भी ऐसा राज्य नहीं है, जहां कांग्रेस की स्थिति बेहतर दिख रही है। राजनीति से इतर राष्ट्रीय मीडिया में भी, 2011 और अन्ना हज़ारे आंदोलन के बाद से ही पार्टी की छवि लगातार दरक रही है। राष्ट्रीयता, आतंकवाद और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी पार्टी का रवैया रक्षात्मक रहा है। राहुल गांधी और उनके जीजा रॉबर्ट वाड्रा को लेकर ज़्यादातर निगेटिव रिपोर्ट ही दिखती हैं। 
  अब अगस्ता वेस्टलैंड मामले को लेकर बीजेपी ने कांग्रेस को अपनी पकड़ में ले रखा है। कांग्रेस का पलटवार काम नहीं कर रहा हैं। लोकसभा चुनाव में हार के बाद कार्यसमिति की बैठक में कहा गया था कि पार्टी ‘बाउंसबैक’ करेगी, पर कैसे और कब? इसपर मंथन नहीं हुआ। राहुल गांधी के नाम पर भी कांग्रेस में दबे स्‍वरों में विरोध तो हैं ही साथ ही कई दफा एक दो कद़दावर नेता राहुल गांधी के विरोध में खुलकर सामने आ चुके हैं। मंथन के बाद पिछले दो सालों में कांग्रेस की तरफ से ऐसा कुछ नहीं किया गया जिससे यह साबित हो की कांग्रेस की ताकत बढ़ रही हैं। 
   तकरीबन आठ साल के बनवास के बाद कांग्रेस की 2004 में सत्ता में वापसी हुई थी। तभी वामपंथी दलों से उसके सहयोग का एक प्रयोग शुरू हुआ था, जो 2008 में टूट गया. उसके बनने और टूटने के पीछे कांग्रेस से ज्यादा सीपीएम के राजनीतिक चिंतन की भूमिका थी। 2004 में सीपीएम के महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत थे। अप्रैल 2005 में प्रकाश करात ने इस पद को संभाला और वे अप्रैल 2015 तक अपने पद पर रहे। उनके दौर में कांग्रेस और वामदलों के रिश्तों की गर्माहट कम हो गई थी। इस साल पहली बार कांग्रेस और वाम दल बंगाल में चुनाव-पूर्व गठबंधन के साथ उतरे हैं। यह गठबंधन केरल में नहीं है, जो अंतर्विरोध को बताता है। असलिए राहुल गांधी व अन्‍य कांग्रेसी चुनाव प्रचार के दौरान पश्चिम बंगाल में वामदलों के लिए गुणगाण करते नजर आते हैं लेकिन केरल में वे वामदलों की आलोचना करते हैं। सोशल मीडिया पर कांग्रेस की इस दोहरे चरित्र की काफी बखिया उघेरी गई हैं। 
  भाजपा-विरोधी धुरी में वामदल और जनता परिवार से जुड़े दल भी हैं। कांग्रेस इसका लाभ उठाना चाहती है। बिहार के पिछले चुनाव में पार्टी जेडीयू और आरजेडी के साथ उतरी थी। लेकिन कांग्रेस को काफी कम सीटे चुनाव लड़ने के लिए मिली। हालांकि, यहां उसे इसका लाभ आंशिक मिला। दसे देखते हुए कहा जा सकता हैं कि अगले साल उत्तर प्रदेश के चुनाव में भी कांग्रेस गठबंधन के साथ उतरेगी। पर, यह गठबंधन व्यापक स्तर पर भाजपा-विरोधी मोर्चा नहीं होगा।   
कहना नहीं गलत होगा कि  कांग्रेस पार्टी बहुत कठिन दौर से गुजर रही है। उसकी राजनीतिक हैसियत में कमी आई है।  पार्टी न तो चुनाव जीत पा रही है और ना ही विपक्ष की भूमिका ठीक से निभा पा रही है। भ्रष्टाचार के मामले में अब तक कोई सबूत सामने नहीं आया है जिससे कि सोनिया गांधी या राहुल गांधी पर कोई सीधा इल्ज़ाम लगे, लेकिन रक्षा सौदे को लेकर ऐसे हालात बने हुए हैं। सोनिया गांधी और कांग्रेस पार्टी, रक्षा सौदे को लेकर काफी संवेदनशील है। राजीव गांधी के राजनीतिक जीवन पर जो बोफ़ोर्स सौदे के दाग़ लगे हैं वो अभी तक नेहरू परिवार का पीछा नहीं छोड़ रहा है। 

Popular posts from this blog

उठहु राम भंजहु भवचापा। मेटहु तात जनक परितापा॥

काश मैं कुत्ता होता...