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Showing posts from May 15, 2016

काश मैं कुत्ता होता...

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कविलाश मिश्रा हाल ही में महानगर में एक सरकारी महकमे की तरफ़ से एक कुता प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। कुत्तों के बारें में मैं ख़ुद को अगर विशेषज्ञ नही मानता था तो उससे से कम भी नही समझता था। गाँव से लेकर शहर तक मेरा पाला कई बार कुत्तों से पड़ चुका था। लेकिन डौग शो में जाकर मैंने पाया की कुत्तों के बारें में मेरी जानकारी किसी नौसिखिये जैसी थी। आयोजन में जाकर मैंने जो देखा उसकी चर्चा तो मैं बाद में करूंगा लेकिन वहाँ पहुंचकर मुझे अपने साथ गुजरा एक वाकया याद आ गया जो मैं यहाँ भी बांटना चाहूंगा कई साल पहले मेरे एक मित्र मेरा कुत्ता प्रेम देखकर मुझे कुत्ता खरीदवाने ले गया। एक डोबर्मन मुझे पसंद आया लेकिन मैंने उसे इसलिए नही ख़रीदा क्यूंकि उसकी कीमत पाँच हज़ार रूपैये थी। लेकिन मैं पसंद आने पर भी एक अन्य पामेरियन भी इसलिए ही नही खरीद पाया क्यूंकि उसकी कीमत भी चार हज़ार रूपैये थी। मन मारकर मैं लौट आया। मेरे दोस्त ने मुझ पर लानत मारी। शौक कुत्ते के और खर्च से डर, भला कैसे संभव है? वक्त बीता। बच्चे बड़े हुए तो घर में कुत्तों की जगह टेडी की शक्ल में कुत्ते और रीछ आने लगे। एक दिन मेरी बिटिया ने ...
दिल्लीवासियों के कठिन परिश्रम के करोड़ों  रूपये विभिन्न राज्यों में प्रचार में व्यर्थ  नई दिल्ली,   दिल्लीवासियों की मेहनत की कमाई को तमिलनाडु, कर्नाटक, उड़ीसा, जम्मू और कश्मीर, गोवा इत्यादि जैसे दूरदराज के राज्यों में विज्ञापन देकर अपना निजी प्रचार करने के लिये मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की कड़ी आलोचना हो रही है। केजरीवाल दिल्ली सरकार के फण्ड को वे अपने आपको अखिल भारतीय स्तर पर प्रोजेक्ट करने के लिये प्रयोग कर रहे हैं जो सरासर गलत है । भारत की राजधानी की सरकार दूसरे राज्यों में विभिन्न भाषाओं में विज्ञापन दे तो यह बात किसी भी दृष्टिकोण से न्यायोचित प्रतीत नहीं होती । दिल्ली की योजनाओं को बाहर के राज्यों में प्रोजेक्ट करने का लाभ मात्र केजरीवाल को निजी प्रचार के लिये तो मिल सकता है परंतु यह जनहित में कतई नहीं हो सकता ।  उन्होंने मुख्यमंत्री को परामर्श दिया कि वे दिल्ली आधारित समाचार पत्रों को छोड़कर विभिन्न राज्यों में विज्ञापन न दें तथा दिल्ली के विकास और कल्याण पर फोकस करें ।    दूसरे राज्यों में विज्ञापन देना अपने आप में एक अजूबा है क्...
वोट बैंक पर कांग्रेस का एक और खतरनाक चेहरा सामने आया  कांग्रेस को डर अब भगवा आतंकवाद पर आसान नहीं राजनीति  नई दिल्‍ली, ( कविलाश मिश्र)।  राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) की ओर से मालेगांव में बम धमाके की आरोपियों को क्लीनचिट दिए जाने पर कांग्रेस सहित खुद को सेक्युलर बताने वाले अन्‍य दलों का एक और चेहरा सामने आया हैं। इसी मामले में पिछले माह जब एक कौम विशेष के आठ लोगों की रिहाई हुई थी तब ऐसे नेताओं को एटीएस पर भरोसा था और साथ ही एेेसे आठ लोगों के लिए मुआवजा देने की मांग कर रह थे। लेकिन कल जब साध्‍वी प्रज्ञा ठाकुर समेत छह को क्‍लीन चिट पर ही हाय तौबा मचा रहे है। मुआवजा तो बाद की बात हैं। अगर वे आठ मुआवजा पाने के अधिकारी हैं तो ये छह क्यों नहीं हैं? आखिर यह दोहरी राजनीति क्यों? क्या इसलिए कि यह छहों हिंदू हैं। अब हिंदू आतंकवाद का जुमला उछालने में मुश्किल पेश आएगी?   महंगाई, आतंकवाद और नक्सलवाद जैसे मुद्दे पर असफल कांग्रेस मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने के लिए हिंदू आतंकवाद का भूत खड़ा कर रही है। देश के ज्यादातर मुद्दों पर उसकी नाकामी राहुल गांधी की ताजपोशी ...