वोट बैंक पर कांग्रेस का एक और खतरनाक चेहरा सामने आया 
कांग्रेस को डर अब भगवा आतंकवाद पर आसान नहीं राजनीति 
नई दिल्‍ली, ( कविलाश मिश्र)। 
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) की ओर से मालेगांव में बम धमाके की आरोपियों को क्लीनचिट दिए जाने पर कांग्रेस सहित खुद को सेक्युलर बताने वाले अन्‍य दलों का एक और चेहरा सामने आया हैं। इसी मामले में पिछले माह जब एक कौम विशेष के आठ लोगों की रिहाई हुई थी तब ऐसे नेताओं को एटीएस पर भरोसा था और साथ ही एेेसे आठ लोगों के लिए मुआवजा देने की मांग कर रह थे। लेकिन कल जब साध्‍वी प्रज्ञा ठाकुर समेत छह को क्‍लीन चिट पर ही हाय तौबा मचा रहे है। मुआवजा तो बाद की बात हैं। अगर वे आठ मुआवजा पाने के अधिकारी हैं तो ये छह क्यों नहीं हैं? आखिर यह दोहरी राजनीति क्यों? क्या इसलिए कि यह छहों हिंदू हैं। अब हिंदू आतंकवाद का जुमला उछालने में मुश्किल पेश आएगी? 
 महंगाई, आतंकवाद और नक्सलवाद जैसे मुद्दे पर असफल कांग्रेस मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने के लिए हिंदू आतंकवाद का भूत खड़ा कर रही है। देश के ज्यादातर मुद्दों पर उसकी नाकामी राहुल गांधी की ताजपोशी में बाधा न बन जाए इसलिए वो हिंदू आतंकवाद जैसे मुद्दों को बेवजह खड़ा कर रही है। पिछले दिनों भाजपा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह ने कहा था कि   केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की सफलता से निराश और हताश कांग्रेस गहरे अवसाद से ग्रस्त है। पार्टी और उसके नेता यह समझ नहीं पा रहे हैं कि इस अवसाद की अवस्था में वो देश के समक्ष कैसे एक जिम्मेदार राजनीतिक दल की भूमिका निभायें।
एनआइए को प्रज्ञा सिंह ठाकुर और पांच अन्य के खिलाफ पर्याप्त प्रमाण नहीं नहीं मिले। उम्‍मीद के अनुसार मुस्लिमों का मसीहा बनने के चक्‍कर में कांग्रेस सहित खुद को सेक्युलर बताने वाले अन्‍य ने कहना शुरू कर दिया कि मोदी सरकार तो इन लोगों की रिहाई के ही पक्ष में थी? लेकिन कांग्रेस के पास इस बात का जबाव नहीं हैं कि आखिर 2011 से लेकर 2014 तक एनआइए यह काम क्यों नहीं कर सकी? कांग्रेस नीत संप्रग शासन के समय इन लोगों को सजा देना क्यों नहीं सुनिश्चित किया जा सका? वैसे भी जिन नेताओं को यह लग रहा है कि एनआइए ने राजनीतिक दबाव में गलत फैसला लिया है उन्हें मालेगांव में ही 2006 में हुए बम विस्फोट के सिलसिले में पकड़े गए आठ आरोपियों की रिहाई पर भी कुछ कहना चाहिए, जिन्हें चंद दिनों पहले ही रिहा किया गया है। एनआइए ने जहां प्रज्ञा समेत छह लोगों को क्लीनचिट दी वहीं कर्नल पुरोहित समेत नौ लोगों पर से केवल मकोका हटाया है। इस कानून के हटाने का कारण यह बताया गया कि एटीएस ने खुद ही पुरोहित के घर आरडीएक्स रखवाया था। यह काम तब हुआ था जब हेमंत करकरे एटीएस प्रमुख थे। 
  यदि पीछे मुड़कर देखे तो  देश की सुरक्षा के साथ समझौता नहीं किया जा सकता लेकिन कालांतर में यूपीए सरकार ने कुर्सी और मुस्लिम वोटो के लिए जो कारनामे किये उसकी मिसाल मिलना बहुत मुश्किल है। हिंदुत्व भारत की आत्मा है लेकिन कांग्रेस ने अपने 2004 से 2014 तक के कार्यकाल में इस आत्‍मा को मारने की पूरी कोशिश की हैं। अभी तक ऐसा उदाहरण नहीं मिला हैं जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि हिन्दू आतंकवादी हैं और साम्प्रदायिक। विदेशी, कांग्रेस और मीडिया का एक भाग बांंटो और राज्य करो की नीति पर चल रहा था इसीलिये नेताजी,शास्त्री जी ,वीर सावरकर,भगत सिंह चन्द्र शेखर आज़ाद को हिन्दू नेता कह कर अहमिता नहीं दी गयी। महाराणा प्रताप, सावरकर, शिवाजी ,राणा सांगा और हिन्दू महान विभूतियों के नाम लेना सविधान विरोधी और साम्प्रदायिक माना जाता जबकि आक्रमंकारियो और क्रूर औरंगजेब शरीको का महामंडित किया जाता। हमने हाल फिलहाल ही देखा कि जब औरंगजेेब रोड का नाम बदलकर भारतरत्‍न एपीजे अब्‍दुल कलाम के नाम पर किया गया था तो किस प्रकार से देश में एक लॉबी ने सरकार विरोधी मुहिम को हवा दी थी। 
  जब देश में 2004 से 2008 के बीच लगातार आतंकवादी घटनाएं घटी और इसमें मुस्लिम बहुत बड़ी संख्या में पकडे गए तो मुसलमानों की बढ़ती नाराजगी के लिए उस वक़्त के गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने भगवा आतंकवाद का मुद्दा उठा कर कहा की उनको जानकारी है की आरएसएस के शिविरों में आतंकवाद की शिक्षा दी जाती है। दूसरी तरफ इस्‍लाम की तरफदारी करते हुए वह यह भी कहते हैं कि आतंकवाद का कोइ धर्म नहीं होता। भगवा आतंकवाद का फायदा पकिस्तान ने उठाया और संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत को आतंकवादी राष्ट्र घोषित करने की मांग की थी। 
 इसके बाद देश में कुछ धमाके मालेगांव,समझौता एक्सप्रेस, हैदराबाद अजमेर में हुवे जिसमे पहले कुछ मुसलमानों की गिरफ्तारी हुई जिसकी अमेरिका से जानकारी मिली थी। लेकिन मुस्लिम तुष्टीकरण के कारन इनका दोष हिन्दुओ पर लगा कर साध्वी  प्रिज्ञा ठाकुर ,कर्नल पुरोहित, स्वामी असीमानंद  और कुछ अन्य को पकड़ा गया उनसे दवाब में आरोप कबूला दिए गए जिसे बाद में अदालत में असीमनन्द  ने कहा की जबरदस्ती कहलवाया गया था। 
   1984 तक कांग्रेस की राजनीति के केंद्र में मुस्लिम व दलित वोट बैंक देखने को मिलते थे। 1989 के लोकसभा चुनाव में जब इन दोनों का कांग्रेस से मोहभंग हुआ तो कांग्रेस का पतन होने लगा। कांग्रेस का जिस प्रकार पतन होता गया व भारतीय जनता पार्टी एक राष्‍ट्रीय पार्टी के रूप में सक्षम होती गई। फिर, 2004 से 2014 तक कई दलों के गठजाेर से कांग्रेस ने यूपीए कस निर्माण कर सरकार चलाई लेकिन इसी दौरान देश को एक कठपुतली प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह देखने को मिला जिसकी डोर सोनिया के हाथ में थी। फिर, इस देश में वहीं हुआ जिसकी कल्‍पना कांग्रेस के भीी पूर्व के नेता नेहरू, शास्‍त्री , इंदिरा, राजीव और पी वी नरसिंहा राव ने नहीं की होंगी। 
  कांग्रेस ने मुस्लिमों को अपने साथ करने के लिए देश हित को भी ताक पर रख दिया। लेकिन, इससे भी कांग्रेस को लाभ नहीं मिला। इसका प्रमुख कारण क्षेत्रीय दल रहेे जो एक प्रकार से मुस्लिमों के सामने अपने कपड़े तक उतार चुके हैं। जब ऐसा करने पर कांग्रेस की बात नहीं बनी तो अब नई नीति के तहत उसे डराने के लिए हिदू आतंकवाद का सगूफा खड़ा किया गया है। कांग्रेस व अन्‍य क्षेत्रीय पार्टियों मुस्लिम वोटों के लिए भय कि राजनीती पर उतर आई है। वर्ष 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को इस प्रयोग का आंशिक लाभ बिहार में क्षेत्रीय दलों को मिला जब जदयू और राजद और कांग्रेस की सरकार बनी। जदयू और राजद के वैतरनी पकड़कर कांग्रेस ने 27 सीटें पाई। अब 2017 में यूपी में लोकसभा चुनाव हैं। 
 

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                        बाक्‍स ----
  वोट बैंक मामले में इशरत जहां मामले को भी भुलाया नहीं जा सकता है। वर्ष 26 नवंबर 2008 को मुंबई में हुए आतंंकवादी हमले का मास्‍टर माइंड हेडली से पूछताछ के दौरान जैसे ही इशरत जहां को लश्‍करे तोएबा का साथी बताया वैसे ही यह बात भी सामने आई की इसरत को बचाने के लिए तत्‍कालीन कांग्रेसी सरकार केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने हलफनामा में बदलाव किया था। हेटली के स्‍वीकार करने के बाद उस वक़्त के रहे उच्च पूर्व के अफसरों ने चिदंबरम पर आरोप लगाया कि हलफनामा में बदलने का दबाव बनाया गया था। 
   गौरतलब हैं कि इंटेलीजेंस विभाग के डायरेक्टर राजेंद्र कुमार ने गुजरात सरकार को लश्‍करे तोएबा के 4 आतंकवादियो की गुजरात में 2002 के दंगे का बदला लेने के लिए मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को मारने के लिए अहमदाबाद में घटना को अंजाम देने वाले है। सूचना के आधार पर अलर्ट पुलिस ने 15 जून 2004 को इशरत जहां ,जो महिला विंग की आत्मघाती दस्ते की मुखिया थी और उसके 3 साथिओ जावेद गुलाम शेख,अमजद अली और जीशान जौहर को पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया। मुस्लिम तुष्टीकरण वाले नेताओ ने और केंद्र सरकार ने इसे फर्जी मुठभेड़ बता कर बहुत हल्ला मचाया  जबकि सच था उस साजिस को नाकाम किया जिसकी दुबई में रचा गया था। 
  26/11 में मुम्बई में आतंकवादी हमले के बाद 2009 में सप्रंग सरकार फिर सत्ता में आई और चिदंबरम गृह मंत्री बने। इशरत मामले में 6 अगस्त 2009 को गुजरात हाई कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया गया जिसमे इशरत को लस्कर का आतंकवादी बताया गया जो गृह मंत्रालय के ऊपर सचिव आरवीएस मणि ने दायर किया था लेकिन गुजरात आरोप हैं कि अहमद पटेल ने सोनिया से कहने पर चिदंंबरम ने हलफनामा बदल दिया जिसमे कहा गया की इशरत को आतंकवादी मानने के सरकार के पास पर्याप्त सबूत नहीं है। यह 30 सितम्बर 2009 को दाखिल किया गया था। पूर्व गृह सचिव में गोपाल पिल्लई ने  बताया की उनको बिना बताये निचले स्तर के अफसरों के साथ मिल कर चिदंबरम ने हलफनामा खुद लिखवाया था और आइबी राजेंद्र कुमार के ऊपर दवाब बनाया की वे अपने व्यान बदल दे लेकिन जब नहीं राजी हुए तो सीबीआई से उनके खिलाफ जांच करवा दी इस तरह देश की दो जरूरी एजेंसीज को आपस में लडवा कर देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ किया। 
   बाद में सीबीआई डायेरेक्टर  रणजीत सिन्हा थे जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने पिंजरे का तोता कहा था। ये काम गुजरात के उस वक़्त के मुख्य मंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह और मुठभेड़ करने वाले पुलिस अफसरों  को फ़साने के लिए किया गया था जो काम लश्‍कर ने किया वहीं काम एक प्रकार से चिदंबरम ने किया। 
    हेडली ने वीडियो कानफ्रसिंग के द्वारा अमेरिका से गवाही देकर इशरत को आतंकवादी बताया और लश्‍करे तोएबा के साथ उसके घनिष्‍ठ संबंध बताया। उसके बाद सबसे पहले उस सरकार के सुरक्षा सलाहकार एम् के नारायण ने हेडली की गवाही के बाद अपने एक लेख के माध्‍यम से बताया कि सुरक्षा एजेंसीज को मालूम था की इशरत एक लस्कर की आतकवादी सदस्य है जो गुजरात में भेजी गयी थी उसके बाद गोपाल पिल्लई ने और बाद में ऊपर संयुक्त सचिव ने जो खुलासे किये वे चौकाने वाले है और ये दर्शाता की सोनिया गाँधी राजनैतिक प्रतिद्वंता के लिए देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ कर देश के दुस्मानो की मदद कर रहे और सबसे ज्यादा हफीज खुश था। मणि ने बताया की वे पहले हलफनामे से सहमत थे लेकिन दूसरा उनसे जबरदस्ती करके हस्ताक्षर कराए गए। एसआइटी के प्रमुख सतीश वर्मा ने बहुत उत्पीडन किया और जलती सिगरेट से गोदा उनका पीछा किया जाता था मंदिर में भी और इसी वजह से दुखी होकर उनके पूज्य पिता की मृत्यु हो गयी। 


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  भाजपा राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह कहते हैं कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी तो इस हताशा में देश विरोधी और देश हित का अंतर तक नहीं समझ पा रहे हैं। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू ) में जो कुछ भी हुआ उसे कहीं से भी देश हित के दायरे में रखकर नहीं देखा जा सकता है। देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारे लगें और आतंकवादियों की खुली हिमायत हो, इसे कोई भी नागरिक स्वीकार नहीं कर सकता। लेकिन कांग्रेस उपाध्यक्ष और उनकी पार्टी के अन्य नेताओं ने जेएनयू जाकर जो बयान दिए हैं उन्होंने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उनकी सोच में राष्ट्रहित जैसी भावना का कोई स्थान नहीं है।
   जेएनयू में वामपंथी विचारधारा से प्रेरित कुछ मुट्ठीभर छात्रों ने “पाकिस्तान जिंदाबाद”,  “गो इंडिया गो बैक”, “भारत की बरबादी तक जंग रहेगी जारी”, “कश्मीर की आजादी तक जंग रहेगी जारी”, “अफ़ज़ल हम शर्मिन्दा है तेरे कातिल ज़िंदा हैं”,  “तुम कितने अफजल मारोगे, हर घर से अफ़ज़ल निकलेगा” ,“अफ़ज़ल तेरे खून से इन्कलाब आयेगा” जैंसे राष्ट्रविरोधी नारे लगाए। इन छात्रों को सही ठहराकर राहुल गांधी किस लोकतांत्रिक व्यवस्था की वकालत कर रहे हैं। क्या राहुल गांधी के लिए राष्ट्रभक्ति की परिभाषा यही है ? देशद्रोह को छात्र क्रान्ति और देशद्रोह के खिलाफ कार्यवाही को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुठाराघात का नाम देकर उन्होंने राष्ट्र की अखण्डता के प्रति संवेदनहीनता का परिचय दिया है | मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि इन नारों का समर्थन करके क्या उन्होंने देश की अलगाववादी शक्तियों से हाथ मिला लिया है ? क्या वह स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति की आड़ में देश में अलगाववादियों को छूट देकर देश का एक और बटवारा करवाना चाहते हैं?
 जेएनयू में राहुल गांधी ने वर्त्तमान भारत की तुलना हिटलर की जर्मनी से कर डाली | इतनी ओछी बात करने से पहले वह भूल जाते हैं कि स्वतंत्र भारत की हिटलर की जर्मनी से सबसे निकट परिकल्पना सिर्फ श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए 1975 के आपातकाल से की जा सकती है | स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति तो दूर, आपातकाल में विरोधियों को निर्ममता के साथ जेल में ठूंस दिया गया था | वामदलों के नेता जिनकी वह आज हिमायत करते घूम रहे हैं, वह भी इस बर्बरता के शिकार हुए थे | हिटलरवाद सिर्फ कांग्रेस के डी.एन.ए. में है, भाजपा को राष्ट्रवाद और प्रजातंत्र के मूल्यों की शिक्षा कांग्रेस पार्टी से लेने की जरूरत नहीं है | हमारे राजनैतिक मूल्य भारतवर्ष की समृद्ध संस्कृति से प्रेरित है और भारत का संविधान हमारे लिए शासन की निर्देशिका है | मैं राहुल गांधी से जानना चाहता हूँ कि 1975 का आपातकाल क्या उनकी पार्टी के प्रजातांत्रिक मूल्यों को परिभाषित करता है और क्या वह श्रीमती इंदिरा गांधी की मानसिकता को हिटलरी मानसिकता नहीं मानते?
  
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