कांग्रेस की नई टीम के लिए आसान नहीं यूपी में राहशीला बूटी से कांग्रेस को कौमा से निकलने की तैयारी
( कविलाश मिश्र)।
उत्तरप्रदेश चुनाव में अभी आठ महीने से ज्यादा का वक्त बचा हैं। सभी प्रमुख पार्टियों ने कमर कस ली हैं। कांग्रेस ने शीला दीक्षित का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए आगे करके यह संकेत दे दिया हैं कि वह उत्तरप्रदेश में किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन के मूड में नहीं हैं। इसका मतलब यह हुआ कि यूपी में चुनावी गणित का पहड़ा बहुकोणीय होगा और इसका लाभ किसे मिलेगा यह कहना फिलहाल जल्दीबाजी हैं लेकिन यदि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव को देखे तो इसी प्रकार बहुकोणीय चुनाव में लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिला था। लेकिन, यह भी सच हैं कि लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव में काफी अंतर होता हैं। पार्टी ने उनके अनुभव और दिल्ली में हुए विकास को इस चयन की वजह बताया।
चर्चा यहां कांग्रेस की हो रही हैं। गणितीय अाधार पर चुनाव जिताने में माहिर प्रशांत कुमार, यूपी प्रभारी गुलाम नबी आजाद, यूपी कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर और प्रियंका गांधी के आत्ममंथन के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए उत्तर प्रदेश में शीला दीक्षित का नाम सामने लाया गया। यदि कांग्रेस का यहां थोड़ा सा भी बढि़या जनाधार हुआ होता तो शायद मुख्यमंत्री के तौर पर नाम प्रियंका गांधी का आया होता लेकिन राज परिवार ( कांग्रेस परिवार) अपने पारिवारिक सदस्य के लिए जोखिम लेना नहीं चाह रहा हैं। इसलिए 78 वर्षीय शीला दीक्षित का नाम आगे लाया गया हैं जिन्होंने दिल्ली के 15 वर्ष (1998-2013) के मुख्यमंत्रित्व काल में राजनीति से सन्यास लेने की बात भी कहीं तो सार्वजनिक रूप से बिहार और यूपी वालों को आड़े हाथों भ्ाी लिया। दिसंबर 2013 में दिल्ली में मिली करारी हार के बाद शीला सक्रिय राजनीति से लगभग दूर ही थीं। संप्रग सरकार ने मार्च 2014 में उन्हें केरल का राज्यपाल नियुक्त किया था। अगस्त 2014 में उन्होंने राज्यपाल पद से इस्तीफा दे दिया था।
शीला दीक्षित पर बड़ी़ जिम्मेदारी हैं। यूपी में कांग्रेस पिछले 26 सालों से कौमा में हैं। इसे संजीवनी देने का जिम्मा इस बार शीला को दी गई हैं। यूूपी में वर्तमान मुख्यमंत्री समाजवादी पार्टी के युवा अखिलेश यादव (40), बसपा सुप्रीमो मायावती (60) से सबसे उम्रदराज शीला दीक्षित हैं। भाजपा ने अभी अपने तरकस से मुख्यमंत्री के तीर नहीं निकाले हैं। लेकिन इतना मान कर चला जा रहा हैं कि राजनीतिक रूप से सबसे अनुभवी शीला ही होंगी।
मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित होने के बाद एक प्रकार से नियमानुसार शीला दीक्षित ने कहा कि वह उत्तर प्रदेश चुनावों में पूरी दृढ़ता और आत्मविश्वास के साथ उतरेंगी। साथ ही उन्होंने कहा कि प्रियंका और राहुल गांधी राज्य के विधानसभा चुना में अहम भूमिका निभा सकते हैं। शीला ने बड़ी जिम्मेदारी देने के लिए कांग्रेस नेतृत्व का शुक्रिया अदा किया। शीला ने कहा कि प्रियंका गांधी पार्टी के लिए बहुत अहम हैं और पार्टी कार्यकर्ता चाहते हैं कि वह विधानसभा चुनाव के दौरान पूरे राज्य में सघन चुनाव प्रचार करें। शीला ने कहा कि वह राजनीतिक तौर पर अहम यूपी में बड़ी लड़ाई के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा कि यूपी में सत्ता में कांग्रेस की वापसी की मांग बढ़ रही है।
प्रियंका को लेकर कांग्रेस के सभी नेता यहीं मांग कर रहे हैं कि प्रियंका पूरी ताकत से चुनावीी प्रचार में उतरें। इसका लाभ कांग्रेस को मिलेगा। यहीं मांग शीला ने भी की हैं। यह एक प्रकार से कांग्रेसी दस्तुर भी हैं और वक्त की नजाकत भी इसे समझ सकते हैं। यदि चुनाव की तिथि घोषित होने तक कांग्रेस को ऐसा लगा कि यूपीी में उसका प्रदर्शन अच्छा हो सकता हैं तो शायद प्रियंका विशेष भुमिका में चुनाव में देखने को मिले। यह यह कहना भी जरूरी हैं कि पिछले दिनों कांग्रेस यूपी संगठनात्मक टीम की तरफ से जो बयान देखने को मिले हैं वह यहीं संकेत दे रहे हैं कि राहुल से ज्यादा मांग प्रियंका की हैं। इसकी एक वजह यह हो सकती हैं कि राहुल को लोगों ने देख लिया हैं जबकि प्रियंका की जांच अभी होनी बाकी हैं।
हालांकि, शीला कहती हैं कि मैं पूरी निष्ठा से जिम्मेदारी निभाने और प्रदर्शन में सुधार के लिए कांग्रेस की मदद करने को तैयार हूं। हम साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे। शीला ने कहा कि प्रियंका और राहुल गांधी उत्तर प्रदेश चुनावों में अहम भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन इस बाबत आखिरी फैसला कांग्रेस आलाकमान को ही करना है। शीला ने कहा कि वह चाहेंगी कि प्रियंका गांधी उनके साथ राज्य में प्रचार करें। कांग्रेस पूरे विश्वास से मैदान में उतरेगी और भाजपा, सपा और बसपा को चुनौती देगी। प्रियंका के बारे में पूछे जाने पर गुलाम नबी कहते हैं कि चुनाव अभी दूर है। उन्होंने यह स्वीकार किया कि पार्टी के कार्यकर्ताओं की मांग रही है कि प्रियंका को रायबरेली और अमेठी से बाहर चुनाव प्रचार करना चाहिए। प्रियंका के बारे में आजाद ने कहा कि ‘‘कांग्रेस से जुड़े हर व्यक्ति की भूमिका है। उनकी पहले से ही भूमिका है और यह उसी तरह जारी रहेगी।’’
यदि उत्तरप्रदेश में कांग्रेस की बात करेंं तो उसके पास वोट बैंक के रूप में कुछ खास नहींं हैं जैसा कि मायावती के बारे में कहां जाता हैं कि उनके वोटों कि में दलित वोट बैंक हैं। समाजवादी पार्टी के खाते में यादव-मुस्लिम हैं और भाजपा के खाते में मध्यवर्गीय और स्वर्ण तबका हैं। लेकिन, ऐसा यूपी में कांग्रेस के पास कुछ नहीं देखने को मिल रहा हैं। राजनीति के जानकार मानते हैं कि पुरानी पार्टी हैं इसलिए आठ से दस फीसदी वोट तो हैं ही लेकिन यह बाकी पार्टियो से काफी कम हैं।
पहले ही कांग्रेस ने स्वयं को जाति आधारित राजनीति पर कसना शुरू का दिया हैं। इसलिए उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ब्राह्मण-मुस्लिम वोट बैंक पर नजर गड़ा रखी है। इसी के तहत उन्होंने शीला को बड़ी जिम्मेदारी दी गई हैं। सोशल इंजीनियरिंग के चलते इस वोट बैंक का बड़ा हिस्सा मायावती के साथ भी गया। केंद्रीय और पूर्वी उत्तर प्रदेश की कई सीटों पर ब्राह्मणों के वोट जीत में अहम भूमिका निभाते हैं। 19 प्रतिशत मुस्लिम मतों को रिझाने के लिए कुछ समय पहले ही गुलाम नबी आजाद को उत्तर प्रदेश प्रभारी नियुक्त किया गया था। कांग्रेस की सीधी नजर साढ़े 14% ब्राह्मण वोट बैंक पर है। इसके अतिरिक्त संगठन के नई टीम में सीएम उम्मीदवार प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर (ओबीसी) , शीला (ब्राह्मण), यूपी प्रभारी आजाद (मुस्लिम), वरिष्ठ उपाध्यक्ष आरपीएन सिंह , चार नए उपाध्यक्ष में राजाराम पाल (ओबीसी), राजेश मिश्रा (ब्राह्मण), भगवती प्रसाद चौधरी (दलित) और इमरान मसूद (मुस्लिम) शामिल हैं। इमरान मसूद ने 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के खिलाफ नफरत भरी जुबान का इस्तेमाल किया था। मसूद ने पिछले लोकसभा चुनाव में विवादित बयान देते हुए कहा था कि वह ‘‘मोदी के टुकड़े टुकड़े कर देंगे।’’
यूपी में शीला के लिए राहें आसान नहीं हैं। कांग्रेस यहां जमीन की तलाश में हैं और जमीन में उन लोगों से तलाश रहे हैं जिसके बारे में शीला दीक्षित काफी सख्त होती थी। चुनावी दौर की बात छोड़़ दें तो दिल्ली में अपने मुख्यमंत्रित्व काल के दौरान उन्होंने दिल्ली की समस्याओं के लिए यूपी और बिहार की जनता को दोषी ठहराती रही हैं। हालांकि, ऐसे बयानों के बाद वे माफी भी मांगती रही हैं। उन पर वर्ष 2010 में हुए राष्ट्रमंडल खेल को लेकर हुए विकास कार्य में घोटाला करने का आरोप हैं। हाल फिलहाल उनपर 400 करोड़़ रूपए का टेंकर घोटाला का आरोप लगा हैं। इसे लेकर उन्हें सम्मन भी जारी किया गया हैं। शीला पर भ्रष्टाचार के आरोपों के बारे में पूछने पर उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी आजाद ने कहा कि अगर भाजपा के आरोपी मंत्री इस्तीफा दे देंगे तो हम भी उम्मीदवार बदल देंगे।