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किसानों के हाथ से निकलता किसान आंदोलन कविलाश मिश्र राजधानी दिल्ली की सीमा पर पिछले 46 दिनों से मुख्यरूप से पंजाब, हरियाणा के किसानों का प्रदर्शन जारी है। किसान और केंद्र सरकार के बीच अब तक हुए आठ दौर की बातचीत का कोई नतीजा नहीं आया है। किसान संगठन तीनों नए कृषि क़ानून को वापस लेने की मांग कर रहे हैं जबकि सरकार कानून में संशोधन करने को तैयार है लेकिन कानून वापस करने को नहीं। सरकार का कहना हैं कि इस कानून से बहुतों किसानों को लाभ हो रहा है। नौवें दौर की बातचीत 15 जनवरी को हैं। लेकिन, वर्तमान समय में ऐसा नहीं लग रहा हैं कि किसान व सरकार के बीच बात बनने वाली है। हालांकि, सरकार को उम्मीद है कि किसान संगठनों के नेता 15 जनवरी को अगले दौर की वार्ता में चर्चा के लिए विकल्पों के साथ आएंगे। केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर का कहना है कि कानूनों को रद्द करने का तो सवाल ही नहीं उठता। ऐसे में लगता है कि अगली बातचीत भी शायद ही किसी नतीजे पर पहुंच पाए! उन्होंने कहा कि बातचीत में आंदोलन में शामिल किसान संगठनों ने नए कृषि कानूनों को वापस लेने की अपनी मांग का कोई विकल्प नहीं दिया है। किसानों के मुद्दे पर 11 जनवरी को शीर्ष अदालत में सुनवाई भी है। दूसरी ओर, किसानों से शुरू हुआ यह आंदोलन अब किसानों के हाथों से लगभग निकल सा गया है। शुरूआती, तीन-चार दौर की बातचीत के बाद ऐसा लगने लगा था कि आंदोलन समाप्त होने वाला है। सरकार कानून में संशोधन को तैयार थी, एमएसपी ( न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर लिखित रूप से देने को वचनबद्ध थी, पराली से संबंधित किसानों की मांग भी मान ली गई थी। लेकिन, फिर किसानों ने कानून वापस करने की मांग पर अड़ गए। इस कारण उसके बाद से जो बातें हुई हैं उसका कोई नतीजा नहीं निकल पाया है। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल के एक बयान से यह संकेत निकाला जा सकता हैं कि माओवादियों-नक्सलियों ने किसान आंदोलन की बागडोर को किसान नेताओं के हाथों से झटक लिया है। किसान नेता कृषि कानूनों में संशोधन के जरिए सरकार से अपनी मांगें मनवाना चाहते हैं पर उन्होंने भी इन नक्सलियों के भय के साए में चुप्पी ठान रखी है। गोयल ने न्यूज एजेंसी एएनआई को दिए इंटरव्यू में कहा कि शायद किसान आंदोलन का कोई लीडर ही नहीं बचा है। सबका विश्वास रहता है कि हमारे लीडर हमारा ध्यान रखेंगे पर शायद यहां ऐसे लीडर हैं ही नहीं। ऐसा डर का माहौल इन नक्सल लोगों ने बना दिया है कि जो किसान नेता असल मुद्दों की बात करना भी चाहते हैं तो किसी में हिम्मत ही नहीं बन पा रही है क्योंकि ये डरा देते हैं। मंत्री के इन बातों में दम भी दिखता है। यदि, आंदोलन स्थल का जायजा लें तो वाम पंथियों के झंडे ही झंडे नजर आतें है। नारें वैसे ही लग रहें है जिस प्रकार के पिछले साल दिल्ली दंगे के दौरान लग रहे थे। किसान आंदोलन में अब अर्बन नक्सल गैंग, टुकड़े गैंग, डफली गैंग, अलगाववादी गैंग और जिहादी गैंग की एंट्रीए खुले तौर पर हो गई है! जेएनयू का टुकड़े-टुकड़े आंदोलन हो या शाहीन बाग का। सीएए विरोधी आंदोलन या फिर किसान आंदोलन। देश में एक गैंग सक्रिय है जो पीछे से इस आंदोलन की रणनीति तय करने लगता है। दरअसल इस गैंग का मुद्दों से कोई लेना-देना नहीं है। टिकरी बॉर्डर पर कुछ कलाकारों का जमघट व उनके द्वारा लगाए गए नारे, शायद उपरोक्त बातों की ओर ही संकेत कर रहे हैं! 20 और 22 सितंबर, 2020 को भारत की संसद ने कृषि संबंधी तीन विधेयकों को पारित किया। 27 सितंबर को भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इन विधेयकों को मंजूरी दे दी, जिसके बाद ये तीनों क़ानून बन गए। इन क़ानूनों के ज़रिए मौजूदा एपीएमसी (एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमिटी) मंडियों के साथ साथ किसान, यदि चाहे तो, उन्हें निजी कंपनियों के साथ भी अनुबंधीय खेती, खाद्यान्नों की ख़रीद और भंडारन के अलावा बिक्री करने का अधिकार होगा। किसानों के लिए बाजार का एक प्रकार से विस्तार कर दिया गया। इन कानून से संबघित अध्यादेशों को किसान पूर्व में खुल कर स्वागत करते दिखे थे। पंजाब के मुख्यमंत्री केप्टन अमरेंद्र भी उस कमेटी में शामिल थे जिस कमेटी ने कानून का मसौदा तैयार किया था। कांग्रेस की घोषणा पत्र में भी इस कानून का जिक्र है। लेकिन, अब विरोध प्रदर्शन करने वाले किसानों को इस बात की आशंका है कि सरकार किसानों से गेहूं और धान जैसी फसलों की ख़रीद को कम करते हुए बंद कर सकती है और उन्हें पूरी तरह से बाज़ार के भरोसे रहना होगा। इससे निजी कंपनियों को फ़ायदा होगा और न्यूनतम समर्थन मूल्य के ख़त्म होने से किसानों की मुश्किलें बढ़ेंगी। हालांकि, तीनों नए क़ानूनों में एपीएमसी मंडियों के बंद करने या एमएसपी सिस्टम को ख़त्म करने की बात शामिल नहीं है। लेकिन, किसानों को डर यह है कि इन क़ानूनों के ज़रिए निजी कंपनियों के इस बाज़ार में आने से अंत में यही होना है। जबकि, बातचीत के दौरान सरकार किसानों के प्रत्येक आंशका को निराधार बताते हुए यह कहा है कि इस कानून के द्वारा किसानों को और भी ज्याद मजबूत किया जा रहा है। सरकार का दावा है कि इस प्रावधान से किसानों को पूरा मुनाफ़ा होगा। बिचौलियों को कोई हिस्सा नहीं देना होगा। लेकिन अनुबंधीय खेती को लेकर किसानों की चिंताएं हैं। किसानों का कहना हैं कि क्या ग्रामीण किसान निजी कंपनियों से अपने फसल की उचित क़ीमत के लिए मोलभाव करने की स्थिति में होगा! साथ ही, निजी कंपनियां गुणवत्ता के आधार पर उनके फसल की क़ीमत कम कर सकते हैं! लेकिन, सरकार का कहना है कि इसे भी रोकने का प्रावधान कानून में है। किसान यदि कुछ संशोधन और चाहे तो सरकार करने को तैयार है। सरकार एमएसपी बहाल रखने और एपीएमसी मंडियों को मज़बूत करने के लिए लिखित आश्वासन भी देने को तैयार है। सरकार इस बात के लिए भी तैयार है कि किसान और निजी कंपनियों में किसी विवाद का फैसला सब डिविजनल मजिस्ट्रेट के ज़रिए ही नहीं होगा, बल्कि किसानों के सामने अदालत जाने का विकल्प भी होगा। लेकिन, किसान संगठन जिसमें से ज्यादातर वामपंथी संगठन के हैं, संसद का विशेष सत्र बुलाकर कानून को वापस कराने की मांग पर अड़े हुए है। इसलिए,, यह संकेत मिल रहे हैं कि यह आंदोलन अब किसानों के हाथों से निकल रहा हैं। हालांकि सरकार को उम्मीद है कि किसान संगठनों के नेता 15 जनवरी को अगले दौर की वार्ता में चर्चा के लिए विकल्पों के साथ आएंगे। ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;; -----------------
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