विधि-विधान से ही करें मंत्र जप व अनुष्ठान
बहुत से लोगों की समस्या है कि मंत्र जप के बाद भी उन्हें मनचाहा फल नहीं मिल पाता है। फिर वे मंत्र को ही बेकार कहने लगते हैं। यह उनकी बड़ी भूल है। विज्ञान भी मानता है कि हर क्रिया के विपरीत समान प्रतिक्रिया होती है। मंत्र जप भी इसी सिद्धांत के अनुसार काम करता है। मंत्र जप करने का असर जरूर होता है। बिना विधि-विधान के जप उसी तरह से सार्थ फल नहीं देता जैसे पानी में कंकर फेंकने से पानी में हलचल तो होती है और कंकर उसके तल में जमा भी होता है लेकिन उसकी साथर्कता नहीं होती। इसी तरह किसी भी तरह से मंत्र जप करने प
र उसका असर तो होता है लेकिन करने वाले को फायदा नहीं होता है।
विधि-विधान से ही करें मंत्र जप व अनुष्ठान
मनचाहा फायदा लेने के लिए जरूरी है कि पूरे विधि-विधान से मंत्र का जप और अनुष्ठान किया जाए। यदि खुद नहीं कर सकते तो किसी भरोसे के योग्य पंडित से कराएं। हर मंंत्र के जप के भी कुछ नियम हैं। उनका पालन करने से शीघ्र और निश्चित फल मिलता है। मैंने पाया है कि अधिकतर लोग, यहां तक की पंडित भी, मंत्र जप के तरीके को ठीक से न जानने के कारण पर्याप्त संख्या में जप करके भी काफी हद तक खाली रह जाते हैं। सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि जप पूरी तरह से निष्फल हो ही नहीं सकते हैं, उसका फायदा अवश्य मिलता है लेकिन अनियमित तरीके और बिना विधि-विधान के जप करने से फल में विलंब या कमी अवश्य हो जाती है। आइये कुछ छोटी-छोटी बातों को जानें. जिस पर ध्यान देकर मंत्र जप का भरपूर फायदा उठाया जा सकता है।
संकल्प, नियत समय और स्थान जरूरी
यदि किसी मकसद/लक्ष्य के लिए जप कर रहे हों तो पहले उसके लिए कामना के साथ मंत्र जप का संकल्प लें। उस समय जप संख्या, हवन, तर्पण (यदि करना हो) आदि निश्चित कर लें। फिर तदनुसार ही जप करें। जप करने से पूर्व स्नानादि कर साफ-सुथरा होकर साफ स्थान-देवालय, सूना घर, पूजा स्थान आदि (जो भी निर्धारित हो) में साफ आसन (आवश्यकतानुसार-कुश, कंबल, मृग छाला आदि) पर बैठककर जप करें। एक ही समय, स्थान और संख्या के साथ नियत तरीके से जप करें। इसमें कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए। यदि बीच में कोई बाधा आती है तो फिर से संकल्प लेकर जप शुरू करना श्रेयस्कर होता है।
माला पर जप सबसे अच्छा
माला पर जप करना सबसे अच्छा होता है। माला किस तरह का हो, वह मंत्र पर निर्भर करता है। जैसे-शिव के मंत्र के लिए रूद्राक्ष सबसे अच्छा है तो बगलामुखी के लिए हल्दी की माला पर जप सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। माला को साफ और बिना टूट-फूट व दाग के कपड़े में लपेट कर रखें। कपड़े को इस तरह से तैयार करें (गोमुखी बनाएं) जिससे जप के दौरान भी माला पूरी तरह से ढका रहे। गोमुखी में से तर्जनी उंगली बाहर रहनी चाहिए। माला से जप करते समय उसके पोर का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। उंगलियों पर भी मंत्र जप किया जा सकता है लेकिन ज्यादा संख्या में उंगली पर जप करना कठिन होता है। बदलते जमाने के साथ-साथ कुछ लोगों ने काउंटर (गिनती गिनने के लिए) शुरू किया है। मेरा अनुभव है कि इस पर भी फल मिलता है।
जप में आवाज न निकले सिर्फ होंठ हिले
मंत्र जप के दौरान उसका उच्चारण सिर्फ इतना हो कि होंठ हिले लेकिन उसकी आवाज सुनकर पास बैठा आदमी भी उसे समझ न सके। कुछ लोग मानसिक जप भी कर लेते हैं लेकिन सामान्य उपासक के लिए सिर्फ होंठ हिलाते हुए लगभग अपने तक ही सिमटी आवाज में मंत्र जप करना चाहिए। मंत्रों के जप का सर्वश्रेष्ठ तरीका यह है कि मंत्रों का तालमेल उपासक के सांस से हो। अर्थात यदि मंत्र जप के दौरान उसके कोई हिस्से को सांस छोड़ते हुए कर रहे हों तो हर बार उस हिस्से को सांस छोड़ते हुए ही करें।
जप के दौरान संबंधित देवता का ध्यान करें
जप के दौरान मंत्र के देवी या देवता का लगातार ध्यान करते रहें। इसी कारण मंत्र जप से पहले ध्यान का विधान है ताकि साधक के मन में मंत्र के देवता का चित्र खिंच जाए और वह स्थिर रहे। जप के दौरान हड़बड़ी न करें। अर्थात तेजी से मंत्र जप करना अच्छा नहीं होता है। जितना समय हो उतना ही जप करें और शांतचित्त से स्थिर होकर करें। जप के समय बैठने के तरीके में बार-बार बदलाव न करें। खुजली, पसीना पोंछना, शरीर के खास हिस्से में दर्द आदि पर से ध्यान हटाकर स्थिर चित्त से जप पर ही ध्यान केंद्रीत रखें।
मंत्र के देवता के अनुरूप वस्त्र और भोजन हो
साधना काल में जिस देवी-देवता के मंत्र का जप कर रहे हों, उसी अनुरूप भोजन, वस्त्र, आसान आदि का चुनाव करें। जैसे-बगलामुखी की साधना के दौरान पीत वस्त्र, पीले फल, अनाज आदि का भोजन ज्यादा उपयुक्त होता है।
जप पूर्ण होने के बाद हवन जरूरी
विद्वानों का मानना है कि सामान्य रूप में किसी भी वैदिक एवं तांत्रिक मंत्र (कुछ को छोड़कर) को तब तक पूर्ण नहीं माना जाता है, जब तक हवन न हो। उनका मानना है कि मंत्र यदि शरीर है तो हवन उसकी आत्मा। जिस तरह आत्मा के बिना शरीर निष्प्रभावी है, उसी तरह हवन के बिना मंत्र की स्थिति होती है। यह काफी हद तक सही भी है।
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उठहु राम भंजहु भवचापा। मेटहु तात जनक परितापा॥ दिल्ली के राजघाट पर चल रहे राम कथा के आंठवे दिन संत मुरारी बापू ने संत और असंत के लक्षणों मानस औ महात्मा गांधी के विचारों के द्वारा बताया। साथ ही उन्होंने इस दौरान नारद और प्रभु राम के उस प्रसंग का भी उल्लेख किया जिसमें नारद प्रभु राम से संत व असंत के लक्षणों को बताते हैं। उन्होंने नवयुवाओं से भी आग्रह किया कि जब भी मौका मिले अपने आराध्य का स्मरण करना चाहिए। इसके लिए क्या दिन और क्या रात। मुरारी बापू कहते है कि जिस लक्षणों के कारण मैं उनके अधीन हो जाता हूं। वे आगे बताते हैं कि जिसको मंहत बनने को कभी इच्छा न हो वह संत हैं। संत वह है जिसका कोई अंत नहीं हैं। कथा के दौरान बापू शिव धनुष भंग , जानकी विवाह , विदाई सहित राजा दशरथ के आयौध्या आने को लेकर ज्ञान के सरोबर में भक्तों को गोता लगाते रहते हैं। नारद मुनि भगवान श्री राम से संतों के लक्षणों के बारे में पूंछ रहे हैं। ’ संतन्ह के लच्छन रघुबीरा। कहहु नाथ भव भंजन भीरा॥ सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ। जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ। ...
